एक और द्रोणाचार्य... वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का आईना...
एक और द्रोणाचार्य : वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का आईना
'एक और द्रोणाचार्य' डॉ० शंकर शेष का एक चुनौतीपूर्ण मिथकीय नाटक है। इसमें महाभारत के अंतर्गत गुरु द्रोणाचार्य का मिथक आधुनिक शिक्षा व्यवस्था को अधिक स्पष्ट रूप से उभारने में सहायक हुआ है।
मूल स्त्रोत :
महाभारत में वर्णित द्रोणाचार्य भारद्वाज ऋषि की संतान थे। जिन्होंने द्रुपद से बदला लेने के लिए कौरवों एवं पाण्डवों को शिक्षा देना प्रारंभ किया था। इसने निषाद पुत्र एकलव्य को शुद्र होने के कारण शिक्षा देना अस्वीकार कर दिया। किंतु अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाए रखने के लिए एकलव्य से उसके दांयें हाथ का अंगूठा मांग लिया। सेवक के नाते दुर्योधन के पक्ष में युद्ध लड़ा। महाभारत के दसवें दिन से सेनापति का पद संभालकर पांच दिन युद्ध किया। युधिष्ठिर द्वारा उच्चरित 'अश्वत्थामा मारा गया' कथन सुनकर पुत्र शोक में व्याकुल निःशस्त्र द्रोणाचार्य का धृष्टद्युम्न द्वारा वध कर दिया गया। 176 इस प्रकार महाभारत में द्रोणाचार्य का मिथक द्रुपद के शत्रु, अर्जुन को श्रेष्ठ धनुर्धर बनाए रखने के लिए एकलव्य (जिसे कभी शिक्षा नही दी) से गुरु दक्षिणा के रूप में दायें हाथ का अंगूठा मांगने वाले गुरु व दुर्योधन के आस्थावान सेवक का मिथक है।
नाट्य रूप-नाटक का कथा विधान :
'एक और द्रोणाचार्य' में शंकर शेष ने महाभारत कालीन स्थितियों एवं पात्रों के माध्यम से आधुनिक परिवेश एवं चरित्रों को उद्घाटित करने का प्रयास किया है। जिससे इसमें आधुनिक स्थितियों व पात्रों के समानांतर ही महाभारत के पात्र द्रोणाचार्य, युधिष्ठिर, अर्जुन, भीष्म, अश्वत्थामा, कृपी एवं एकलव्य आधुनिक चरित्रों-अरविन्द, ललिता. राजकुमार, चंदु, प्रिंसिपल और प्रेजीडेंट की त्रासदी को उभारते चलते हैं। वर्तमान युग के अध्यापक की दयनीयता का चित्रण महाभारत के सशक्त पात्र द्रोणाचार्य के द्वारा किया गया है। इसमें मिथकीय पात्रों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिवेश के साथ ही समकालीन भोगे हुए क्षणों को भरने का प्रयास मात्र है।
एक और द्रोणाचार्य नाटक की मूल संवेदना :
'एक और द्रोणाचार्य' में मिथक संबंधी व आधुनिक दोनों कथाएँ समानांतर चलती हैं जिनका उद्देश्य समकालीन जीवन की संवेदना को प्रभावशाली ढंग से उभारना है। हमारी समकालीन राजनैतिक, सामाजिक, एवं नैतिक विसंगतियों और समस्याओं को महाभारत कालीन द्रोणाचार्य के द्वारा आज के शिक्षक अथवा तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग की समझौतावादी वृत्ति को अपनाने वाले अरविन्द की कथा साथ-साथ चलती है।
प्रथम द्रोणाचार्य अपनी पत्नी के सुविधा भोग की वृत्ति के लिए उकसाये जाने पर व्यवस्था के हाथों बिककर स्वत्व को नष्ट कर देते हैं। द्वितीय सुविधाओं के क्रीतदास बनकर उचित अनुचित का ख्याल छोड़कर अपने शिष्य अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाये रखने की प्रतिज्ञापूर्ण करने की लालसावश एकलव्य जिसे कभी शिक्षा नहीं दी से गुरु दक्षिणा में उसके दायें हाथ का अंगूठा मांग लेते हैं और उसकी प्रतिभा को सदा के लिए कुचल देते हैं और सदा के लिए शिक्षक वर्ग पर निरंकुश भ्रष्ट व पक्षपाती का कलंक लगा देते हैं।
एकलव्य : ....आप आशीर्वाद दे रहे हैं या शाप? .... क्या आप इस अर्जुन से कभी उसका दाहिना हाथ मांग सकते हैं? क्या आप भीम से उसकी भुजा मांग सकेंगे? "
अर्जुन : .. इतिहास आपको कभी क्षमा नहीं करेगा। "
तृतीय व्यवस्था के हाथों बिके द्रोणाचार्य द्रौपदी की पुकार-पुकार कर की गई मर्मभेदी आवाज को भी नहीं सुन सके। अपने ही शिष्यों की पत्नी को सार्वजनिक रूप से अपमानित होते देखते रहे। यही नहीं द्रौपदी के सार्वजनिक अपमान तथा अभिमन्यु की चक्रव्यूह में अनैतिक हत्या आदि सभी अन्यायपूर्ण स्थितियों के साक्षी रहे। अन्याय का चुपचाप साथ देने के कारण उन्होंने गलत परंपराओं को जन्म दिया। इसी कारण अंतिम अर्थात् चतुर्थ प्रसंग में युद्ध के दौरान अश्वत्थामा हाथी के मरने पर गुरु दक्षिणा के रूप में सत्य वचन मांगने पर धर्मराज युधिष्ठिर भी अस्पष्ट-सा झूठ मिश्रित सत्य बोल देते हैं। जिसके कारण स्वयं गुरु द्रोणाचार्य मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
द्रोणाचार्य के जीवन से संबंधित इन चारों मिथकीय प्रसंगों को प्रोफेसर अरविन्द के जीवन के समानांतर रखकर डॉ० शेष ने आधुनिक शिक्षक की त्रासद संवेदना का उद्घाटन किया है। महाभारत कालीन द्रोणाचार्य की प्रत्येक जीवन वृत्ति का साम्य अरविन्द की कथा में निहित है। अरविन्द भी अपनी पत्नी लीला के आग्रह के कारण प्रिंसिपल बनता है। द्रोणाचार्य की भांति ही प्रेजीडेंट के लड़के राजकुमार की नकल पकड़ने पर प्रेजीडेंट द्वारा नौकरी से निकाल दिये जाने की धमकी और पत्नी, मित्र व प्रिंसिपल द्वारा परिवार के दायित्वों का बोध उसे नैतिक बोध को भुला देता है और वह रिपोर्ट दबा देता है।
यदु : और नहीं तो क्या। माँ कैंसर से अस्पताल में पड़ी है। विधवा बहन हर पहली तारीख को तुम्हारे मनीऑर्डर का इंतजार करती है। लड़के को मेडिकल कॉलेज भेजना है। इनकी तरफ देखो। छोड़ो ये सिद्धान्त, उद्धान्त का चूतियापा। "
सुविधा और सुरक्षा के आकर्षण के कारण ही अरविंद चन्दु के न्यायोचित पक्ष का गला घोंट देता है। फलतः नकल न करने पर भी चन्दु को कॉलेज से निष्कासित होना पड़ता है। राजकुमार नकल करते हुए भी कॉलेज का विद्यार्थी बने रहता है। रिपोर्ट दबाने के कारण अरविंद प्रिंसिपल बन जाता है।
प्रेसिडेंट की कृपा भोगने के कारण राजकुमार द्वारा अनुराधा के साथ बलात्कार का प्रयास किये जाने पर भी अरविन्द नपुंसक बनकर केवल देखता रह जाता है और चाहकर भी कोई सार्थक प्रयास नहीं कर पाता। प्रकारांतर से आज का द्रोणाचार्य भी द्रौपदी की चीख पुकार सुनकर उसका विरोध नहीं करता।
इस प्रकार व्यवस्था के हाथों बिक कर न्याय का पक्ष न लेने के कारण आज का शिक्षक अरविन्द भी द्रोणाचार्य की भांति अपने शिष्यों को मनुष्य बनने की शिक्षा नहीं दे पाता और प्रेसिडेंट के मरने पर अरविंद पर इल्जाम लगने पर
कोर्ट में गवाही देते समय-
पहली आवाज : क्या प्रोफेसर अरविन्द ने प्रेसिडेंट को धकेला?
चन्दु : हो सकता है।
कहकर युधिष्ठिर के अश्वत्थामा मारा गया। वह नर था.... बुदबुदाकर वा कुंजर।" की स्थिति में पहुँच जाता है।
इन सब घटनाओं से अरविन्द "व्यवस्था और सत्ता के कोड़ों से पिटा हुआ द्रोणाचार्य-इतिहास की धार में लकड़ी के ठूंई की तरह बहता हुआ, वर्तमान के कगार से लगा हुआ-सड़ा-गला द्रोणाचार्य " ही सिद्ध होता है।
एक और द्रोणाचार्य नाटक की युगीन प्रासंगिकता
आलोच्य नाटक 'एक और द्रोणाचार्य' शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त अनेक समस्याओं को आधार बनाकर लिखा गया है जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक जीवन की अनेक विसंगतियाँ जैसे राजनीति का बढ़ता प्रभाव, नारी जाति का अपमान मध्यमवर्गीय परिवार की छोटी-बड़ी परेशानियाँ शक्कर के भाव बढ़ना अर्थात् महंगाई, बिजली का होना, राशन कार्ड की समस्या भी चित्रित की गई है। किन्तु प्रत्यक्ष रूप से नाटककार ने द्रोणाचार्य के मिथक द्वारा आज के शिक्षक एवं इसकी परिस्थितियों को एवं समकालीन वैचारिक द्वंद्व को व्यापक प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत किया है। नाटक में उठाये गये महाभारत कालीन द्वंद्व आज भी हमारे जीवन में उतने ही ज्वलंत हैं जितने कि प्राचीन काल में थे। महाभारत कालीन द्रोणाचार्य जहाँ व्यवस्था की चक्की में पिसकर अन्याय का साथ देते हैं। भरी सभा में द्रौपदी के वस्त्रहरण के अनर्थ को सुविधाओं के समक्ष पंगु बनकर देखते रहे और शिक्षक वर्ग को अन्याय पीने की परंपरा दे गए।
स्त्री का अपमान केवल आधुनिक युग की ही देन नहीं है महाभारत युग से ही स्त्री अपमान के घूंट को पीती रही है। सच्चाई से पलायन मिथकीय युग से आज तक सुविधाभोगी वृत्ति के कारण चला आ रहा है। परिवेश बदलने पर भी परिस्थितियाँ नहीं बदलती। अरविन्द चन्दु जैसे सच्चाई के मार्ग पर चलने वाले विद्यार्थी को धोखा देता है और व्यवस्था के हाथों बिककर राजकुमार जैसे कुमार्गी का मार्ग और प्रशस्त कर देता है इसी संदर्भ में ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार द्रोणाचार्य यह जानते हुए भी कि पांडव न्याय के पथ पर एवं दुर्योधन आदि अन्यायी व अत्याचारी हैं, कौरवों का साथ देता है।
अनुराधा द्रौपदी का आधुनिक संस्करण है। कौरव सभा के सभी विद्वत जनों के साथ गुरु द्रोण भी द्रौपदी के चीर हरण का विरोध नहीं कर पाते वहीं आधुनिक प्रसंग में प्रोफेसर अरविंद भी प्रेसिडेंट की कृपा भोगने के कारण अनुराधा का साथ और राजकुमार को दण्ड नहीं दे पाते। व्यवस्था के आगे झुकाने वाली परिस्थितियाँ उस युग की भाँति इस युग में भी व्यक्ति को अपनी अंतर्रात्मा को कुचल देने को बाध्य कर देती हैं।
मुख्य रूप से सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था में शिक्षक की भूमिका के संदर्भ में दोनों युगों में अत्यधिक अंतराल होने पर भी अत्यधिक साम्य है। सामाजिक जीवन की समस्याएँ प्राचीन युग में हों या आज के युग में। राजनीति महाभारत कालीन हो या आज की व्यक्ति केन्द्रित। आज की व्यवस्था की पीड़ा आज के व्यक्ति को भी बहुत हद तक उस युग के व्यक्ति की भाँति ही झेलनी पड़ती है।
सच्चाई के मार्ग पर चलने वाला और जीवन उत्सर्ग कर देने वाला एकमात्र शिक्षक पात्र विमलेन्दु जो कि मृत्योपरांत एक छाया व ध्वनि के रूप में उभरकर आता है, की त्रासदी को बार-बार उभारा गया है।
एक सच्चे व नेक शिक्षक की नकल पकड़ने के विरोध स्वरूप गुंडा संस्कृति बीच चौराहे पर जान ले लेती है। विमलेन्दु की आत्मा जो उसके परिवार का स्थान-स्थान पर विश्लेषण करती है उसके अनुसार-
विमलेन्दु : "और नहीं तो मेरी कोई उम्र थी मरने की। तीन साल पहले शादी हुई थी। फूल-सी बच्ची। पत्नी का उबलता प्यार। नाटक की दुनिया में नाम पैदा करने की ख्वाहिश। सब धरा का धरा रह गया।... छोटी-सी नौकरी पर अपना पेट पाल रही है। बच्ची का पेट पाल रही है। कभी-कभार मेरी याद में रोती है। .... उसे लोग चैन से कहां रहने देते हैं? उसका एक नया अफसर आया है। साठ साल उम्र है उसकी। वह डोरे डाल रहा है मेरी पत्नी पर। प्रमोशन का लालच दे रहा है।"
आज की इस दमघोंटू व्यवस्था जिसने इंसान को इंसानियत से दूर सच्चाई, ईमानदारी और नैतिकता से बहुत दूर ले जाकर पटक दिया है। आज अकेली नारी की सुरक्षा मात्र भ्रमजाल है। विमलेन्दु की पत्नी भी अंत में उस अफसर की भूखी नजर से बचने के लिए शहर छोड़कर चली जाती है। सच्चाई पर बलिदान हुए विमलेन्दु के साथ ही उसके परिवार की त्रासदी और भी अधिक गहन हो जाती है।
एक और द्रोणाचार्य नाटक की प्रतीकात्मकता :
नाटक में नाटककार चरित्र को अपने विचार प्रकट करने का माध्यम मानता है। शंकर शेष ने 'एक और द्रोणाचार्य" में जिन पौराणिक और आधुनिक पात्रों का प्रयोग किया है। वो सभी एक निश्चित अर्थ को द्योतित करने वाले प्रतीक हैं। अरविन्द मिथकीय पात्र द्रोणाचार्य का प्रतीक हैं जो शिक्षक के आदर्शों का पालन करना चाहकर भी परिस्थितियों और सुविधाओं के आने विवश हो जाता है जो द्रोणाचार्य की भाँति राजकीय सुखों का भोग करते-करते सुविधाभोगी प्रवृत्ति से ग्रस्त हो जाता है। जो अन्याय को जानते हुए भी एकलव्य से उसके अंगूठे की मांग करता है। द्रौपदी के अपमान को खुली आंखों से देखकर भी प्रतिकार नहीं करता। वस्तुतः आकांक्षा जगत की पूर्ति करने वाली व्यवस्था के समक्ष अपने अंदर के मनुष्य और शिक्षक के दायित्व को कुचल देता है। प्रोफेसर अरविन्द में द्रोणाचार्य के इस प्रतीक का निर्वाह अंत तक चलता है।
अरविन्द : मैं द्रोणाचार्य नहीं, अरविन्द हूँ, प्रोफेसर अरविन्द।
विमलेन्दु : बकवास। तू द्रोणाचार्य है। कौरवों की भाषा बोलने वाला, युद्ध में भी उसका साथ देना वाला। तू किस बात का प्रोफेसर ? तू द्रोणाचार्य है।
अरविन्द की पत्नी लीला द्रोणाचार्य की पत्नी कृपी का प्रतीक है। जो मध्यमवर्गीय अभावग्रस्त जीवन से तंग आकर बिना समझौते के सुविधा संपन्न जीवन जी पाने में असमर्थ होकर अपने पति को व्यवस्था के समक्ष झुकने के लिए विवश करती है।
लीला : प्रिंसिपल नहीं बनोगे ?
अरविंद : कीमत जानती हो?
लीला : बिना कीमत दिए कुछ मिलता भी है।
चन्दू न्याय के लिए लड़ने वाले छात्र नेता का प्रतीक है। प्रोफेसर अरविन्द न्याय के लिए प्रयत्नशील चन्दू की कॉलेज के प्रबंधक से समझौता कर ठीक इसी प्रकार बलि चढ़ा देता है। जिस प्रकार एकलव्य से द्रोणाचार्य गुरु दक्षिणा में हाथ का अंगूठा मांग लेता है। दूसरी और अंत में अदालत वाले प्रसंग में चन्दू का चरित्र भावना के स्तर पर युद्धिष्ठिर के करीब भी पहुँच जाता है।
अनुराधा द्रौपदी की प्रतीक है : जो निडर है जागरूक है और अपनी जिंदगी अपने अनुरूप जीना चाहती है। अपने साथ हुए अपमान का बदला लेना चाहती है। और राजकुमार की धमकियों से नहीं डरती।
अरविंद : तो तुम चाहती क्या हो?
अनुराधा : एक्शन
अरविन्द : मां-बाप की मर्जी के खिलाफ ?
अनुराधा : जी हाँ। अपनी मर्जी के खिलाफ जीकर क्या करूंगी।
अनुराधा : जानते हैं मेरे पिता को धमकाया जा रहा है?
अरविन्द : कौन धमका रहा है?
अनुराधा : राजकुमार और उसके साथी।
अरविन्द : क्या धमकी दी है।
अनुराधा : मेरे पीछे गुण्डे लगाने की। राजकुमार जो कुछ नहीं कर पाया, उसे पूरा करवाने की। मेरे पिता को जान से मारने की।
इतनी सब धमकियों और शक्ति के प्रयोग के समक्ष भी अनुराधा नहीं झुकती अपितु अरविन्द (द्रोणाचार्य का प्रतीक) से साथ देने को कहती है। परन्तु द्रोणाचार्य की भाँति अरविन्द सत्ता के समक्ष नतमस्तक हो जाता है और निराश अनुराधा आत्महत्या कर लेती हैं।
राजकुमार दुर्योधन का प्रतीक है। जो द्रोपदी रूपी अनुराधा का अपमान करता है। जो बूढ़े बाप का बिगड़ा हुआ पुत्र है सभी प्रोफेसरों को अपने बाप का नौकर समझता है जिसकी सभी हरकतों पर उसका पिता प्रेसिडेंट धृतराष्ट्र की भांति सही की मोहर लगवा देता है। प्रिंसिपल तथा प्रेसिडेंट वर्ग विशेष के प्रतिनिधि पात्र हैं। जो शिक्षा जैसे पवित्र कर्म को अपनी स्वार्थसिद्धि का मार्ग बना लेते हैं।
विमलेन्दु अरविन्द के मानस रूप का प्रतीक है। जिसमें अरविन्द के मन का भय व द्वंद्व शंकर शेष का चिंतन भी समाहित है। जो तीव्र संवादों में निहित प्रश्नचिहन से वर्तमान जीवन की नियति की सच्ची तस्वीर उभारता है।
अरविन्द: लेकिन वह केवल एक विचार था।
विमलेन्दु : फिर झूठ। वह केवल विचार नहीं थां उसमें योजना का बीज था।
अरविन्द : याद नहीं आता।
विमलेन्दु : फिर झूठ, मुझसे झूठ बोलकर जाओगे कहाँ?
1971 में लिखे गए इस नाटक ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल की हैं। व्या
प्रखर व्यावसायिकरण के दौर में शिक्षा संस्थानों की हालत गंभीर है। शंकर शेष ने इसे प्रखरता से उजागर किया है।
डॉ गोविंद गुंडप्पा शिवशेट्टे
प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
महाराष्ट्र महाविद्यालय, निलंगा जिला लातूर
9423909705

बहुत बढ़िया
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