आर एम जे मिन्स रावसाहेब मां-बहन जाधव
नांदेड़ जैसे शहर से पहली बार का मेरा परिचय २००५ का । गजब का संयोग था यहां पहुंचने का…बीए तृतीय वर्ष की शिक्षा पुरी कर आगे मैं एम ए की शिक्षा के लिए हैद्राबाद जाने की बहुत आस लगाए बैठा था किंतु अज्ञानतावश और किसी के भी मार्गदर्शन के अभाव में मैं उल्टे पांव नांदेड़ आया। सोचा चलो जो मकसद हैदराबाद जाकर पुरे करने है उसको पीपल्स कॉलेज में भी तो पूरे किये जा सकते हैं। जुन के माह में प्रवेश लिया। उस समय यह महाविद्यालय एक नामचीन महाविद्यालयों में शुमार था। नया महाविद्यालय, नये दोस्त, सब कुछ नया था। उत्साह में कहा कमी थी। तासिका करने के लिए निकल पड़े । जिनका पहली दफा परिचय हुआ वे यशवंतकर संतोषकुमार, अनिलकुमार राठोड़,भगवान कदम साथ-साथ सायों की तरह थे। तासिका करने के लिए कक्ष १०४ में जब पहुंचे तब लगा कि समय-सारणी पहले देख ले। तासिका समय सारणी देखने लगे तो पाया सोमवार ७:३० से ८:४० RMJ की तासिका है। अन्य अध्यापकों के नाम भी STD,RPN के रुप में दर्ज थे। हम ठहरे नितांत देहांत के, नाम का इतना संक्षिप्तीकरण समझ से परे था । फाइनली तासिका में जा पहुंचे। एक लंबी कद-काठी, रंग गोरा, छरहरी काया,खुबसूरती का क्या कहना, बाल हवां के झोंके से लहराते ,इनशर्ट किया हुआ एक अध्यापक आ धमका। हम सभी ने उठकर एक साथ नमस्ते सर की आवाज में स्वागत किया । इससे सारा हॉल गुंज उठा। “आरे बैठो -बैठो” की ध्वनि ने माहोल शांतता में बदल गया। सबका एक-एक से परिचय होने लगा। अंततः आर.एम.जे इस संक्षिप्तीकरण का विस्तारिकरण समझ आया- रावसाहेब मोहन जाधव।
एम.ए प्रथम वर्ष में पीपल्स कॉलेज के हिंदी विभाग में एक से बढ़कर एक अध्यापक थे। जिनकी अपनी अलग पहचान थी। हिंदी विभाग के चार आधारस्तम्भ थे सबसे पहले स्वर्गीय डॉ शोभा देशपांडे जी जिनकी भाषा और काव्य विधा पर की पकड़ गजब की थी। कामायनी, अंधेरे में ,यशोधरा पढ़ाने की अद्भुत शैली आज भी स्मरण से हट नहीं पाते हैं। मैं ही नहीं सारा कॉलेज उनके आंखों के डर को आज भी महसूस करता है । पर एक अदबदार व्यक्तित्व जिसका कोई सानी नहीं है। दूसरा स्तंभ स्वर्गीय डॉ सत्यजीत चिखलीकर एक रंगीन मिजाज की सदाबहार व्यक्ति रेखा। सिर पर बचे खुचे लंबे बालों को कंघी से सामने लाकर गंजापन को छुपाने की करतब करनेवाले , मुंह में हमेशा पान, लाल जर्द रंग से रंगे ओट ,आवाज में खुरदरापन, पुस्तकों में खोया हुआ ,परीक्षा के लिए नहीं दूरदृष्टी रख कर पढाने की सोच वाला अध्येयता, बेलाग बोलने की क्षमता रखनेवाले,हंसी के फव्वारे क्या क्या लिखूं…मेरे प्रति उनका खास स्नेह रहा है…वे बोलते थे तु बिल्कुल मेरे जेसा बनेगा। मैं उनके जैसा अध्यापक तो बन नहीं सका,समय ने सर और मुझमें गजब की समानता लायी वै भी अंध गंजे थे और मैं उनसे आगे निकलकर पूरे गंजेपन की दौड़ लगा रहा हूं। कबीर का फक्कड़ पन ,बिहारी की श्रृंगारिकता, भूषण की वीरता, रहिम की प्रेम पुरकता एक ही व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलु थे श्रध्येय चिखलीकर जी मे। तिसरी स्तंभ डॉ रमा नवले जी। मध्यम कद-काठी ,चहरे पर झलकता नुर,वाणी में शहद सी मधुरता , रहन-सहन सामान्य, उच्च विचारधारा के सिध्दांतों पर डटे रहने वाले , अध्ययन -अध्यापन में रमने वाली रमा मैम, मेरे बच्चे आगे बढ़े इसलिए प्रश्न तैयार करना ,चर्चा के लिए विषय देना, कक्षा में चर्चा कराना रमा मैम के अध्यापकीय वैविध्यता है। काव्यशास्त्र,नाटक,उपन्यास,कहानी,समीक्षा,गद्य तथा गद्य की अन्य विधा इनके पसंदीदा विषय । मैं ही नहीं समग्र विद्यार्थी मैम के पढ़ाने की शैली के कायल रहे। कौन भूल सकता है चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त,गोदान,मैला आंचल,आधे अधूरे,आषाढ़ का एक दिन,तमाम कहानियां, काव्यशास्त्रीय तमाम सिध्दात मानो सारी कक्षा साधारणीकृत हो जाती थी। जो अब ये सेवा अवकाश पा चुके हैं। इस विभाग का चौथा स्तंभ डॉ रावसाहेब जाधव जी…
हंसमुख मिजाजी, विद्यार्थियों में खोया हुआ। मिठी जुबान ,दिलकश रहनुमाई, जिनके कथनी और करनी में समानता हमेशा रही। जिस तरह यह व्यक्ति शारीरिक रुप से सीधा दिखता है । ठिक वैसे ही विचारों में बेहद सीधा-साधा,कहीं कोई घुमावदार पन,क्लेश ,आपसि रंजिश, बांकपन न रखनेवाला अवलिया। सबके साथ बेहतरीन तालमेल रखनेवाले,नेक दिल इंसान जिनको दबी दबी आवाज में हम छात्र पीपल्स कॉलेज के शाहरुख खान कहा करते थे। जो हमें हिंदी साहित्य का इतिहास विषय पढ़ाया करते थे। साहित्येतिहास लेखन परम्परा, आदिकाल,मध्यकाल, आधुनिक काल तथा सभी विधाओं का विकासात्मक अध्ययन जो कि सर ने पढ़ायें है। बच्चों को समझ आये इस भाषा में , बच्चों में घुल-मिलकर पढ़ाने की शैली छात्रों को खुब रास आती थी। इसलिए वे छात्रों के चहेते अध्यापकों में शुमार रहे। उनका एक वाक्य छात्रों में बड़ा लोकप्रिय हो चला था- “मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि”
डॉ रावसाहेब जाधव सर अपने छात्रों के साथ घुल-मिल जाते थे। बच्चों की अलग-अलग स्तर पर मदद करना उनके स्वभाव का हिस्सा था। एक सच्चा अध्यापक वहीं होता है जो बच्चों की मानसिकता की नब्ज को समझता है। जाधव सर उन्हीं विरले अध्यापकों में है । मुझे ज्ञात है जब हम पीएच डी का पंजीकरण करना चाहते थे । उस समय विश्वविद्यालय की जो फिस होती थी उतनी फिस अदा कर पाने कि हमारी हैसियत नहीं थी। और हम पंजीकरण कर नहीं पा रहे थे। यह उड़ती हुई खबर रावसाहेब जाधव सर तक पहुंची । क्षण का विलंब न करते हुए उन्होंने हमें हिंदी विभाग में बुलाकर कहां -”क्या दिक्कत है पीएच.डी पंजीकरण करने में ।” हम चुप्पी साधे खड़े थे। इस चुप्पी की भाषा समझकर सर ने कहा ये ले पैसे और जल्द से जल्द फिस अदा कर पंजीकरण कर लेना। हम समझ नहीं पा रहे थे कि सर का ऋण कैसे चुकाए ।
हमे कुछ करना हो तो सर की सलाह जरूर लिया करते थे। हम जब रुम लेकर रहने लगे खर्चा हमारे हद्द के बाहर होने लगा । उस परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए हम सभी ने सोचा चलो हम एक कंप्यूटर ख़रीद लेते हैं। तय हुआ और सर से सलाह लेने उनके आवास पर पहुंचे। हम कहने लगे सर हम सामुहिक रुप में कंप्यूटर लेने की योजना बना रहे है… कैसा रहेगा । सर कहने लगे “अरे ऐसा मत करना…झगड़े हो सकते हैं। आपकी एकता बिखर सकती हैं…मेरा तो यही कहना है कि लेना है तो वैयक्तिक ले लो।” हम अपनी बात पर अडिग रहे और सबने मिलकर एक कंप्यूटर ख़रीद लिया। बड़े सुचारू रूप से नियोजित योजना को अंजाम देते गये । और यह बात सर तक जा पहुंचीं और तब से सर का हमारे प्रति विश्वास और अधिक बढ़ता गया।
मैं 2006 में स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, नांदेड़ द्वारा ली गयी परीक्षा में हिंदी में सर्व तृतीय स्थान पाया। वहां से निलंगा के महाराष्ट्र महाविद्यालय में तालिका बेस पर काम करने लगा। हमारा अध्ययन ही हमारी पुंजी रही। कोई गॉड फादर नहीं था हमारा। किंतु हमारा यक़ीन था कि -
“इरादे अटल हो तो सफलता चलकर आतीं हैं।
समुद्र राह देते हैं, चट्टानें थरथराती है।”
30 सितम्बर 2008 को हमारे महाविद्यालय के हिंदी विषय का इश्तेहार निकला और 29 सितंबर को साक्षात्कार निश्चित हुआ। जिसका कोई नहीं होता उसका ख़ुदा होता है। यह विचार उस समय मुझे बार-बार धाडस बंधा रहे थे। राव साहेब जाधव सर एक्स्पर्ट पॅनल में थे। उन्होंने कहा चिंता मत कर ‘मैं हूं ना’ शाहरुख वाला डायलॉग दोहरा कर मेरे मन की अस्वस्थता को स्वस्थ बना रहे थे। 28 सितंबर को सर को फोन किया कि आपको निलंगा आना है सर । सर सर्दी, जुक़ाम तथा बुखार से परेशान थे। पर कह रहे थे मैं दवाई लेकर आऊंगा मतलब आऊंगा। साथ में भगवान और माधव को जोड़ा था । सर आये और अनेक जद्दोजहद के बाद मेरा चयन हुआ। जिनके फैसलों ने हमारी तकदीर बदलकर रख दी। आज उस घटना को 18 साल हो गये । कुछ घटनाएं भुल जाते हैं किन्तु कुछ घटनाएं हमारे जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन जाती हैं उन्हीं घटनाओं में से एक है यह अविस्मरणीय घटना । इसके बाद तो सर हमें अपने परिवार का एक हिस्सा मानते रहे हैं।
जिन्होंने हमेशा दिया है लिया कुछ नहीं। ऐसे निःस्वार्थ व्यक्ति ने हमें हमेशा प्रेरणा दी है। हम भी कोशिश कर रहे हैं कि गुरु के कदमों निशान पर हम भी चले । हम यकीन दिलाते हैं कि आपके विचारों को ताउम्र निभायेंगे। आज वे 12 अगस्त 2025 को नियमित आयुर्मान से सेवावकाश पा रहे हैं। यही अवसर हम सभी छात्रों ने चुना कि एक अध्यापक का छात्रों की ओर से बेहतरीन अभिनंदन हो, उचितम् स्वागत से विदाई दी जाए। सभी ने साथ दिया इसी कारण समारोह निर्णायक मोड़ तक पहुंचा है। सर को दीर्घायु और स्वास्थ्य मिलें की कामना करते हैं।
डॉ गोविंद गुंडप्पा शिवशेट्टे
प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
महाराष्ट्र महाविद्यालय, निलंगा जिला लातूर
9423909705


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