उलगुलान संपूर्ण क्रांति का नारा

 उलगुलान संपूर्ण क्रांति का नारा - डॉ. जी जी शिवशेट्टे

 भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अनेकों वीर एवं क्रांतिकारियों ने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर देश के लिए बलिदान दिया । उन वीरों में आदिवासी या जनजातीय समाज के योद्धा भी अग्रणी रुप थे। आदिवासियों के कल्याण, उनकी प्रगति, उत्थान और देश की आज़ादी में योगदान देने के लिए आगे आए। जिनमे सिध्दो -कान्हो, पुरुलिया,टंट्या भील, राणा पुंजा, खाज्या नायक प्रमुख हैं । इन वीर योद्धाओं में से एक विशेष क्रांतिकारी हुए बिरसा मुंडा। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को आदिवासी दंपत्ति सुगना मुंडा और करनी मुंडा के घर हुआ था। बिरसा मुंडा का जन्म स्थान रांची के पास उलीहातु (झारखंड) में हुआ था। उनके माता-पिता खेतिहर मज़दूरी करके अपना जीवन यापन करते थे। आर्थिक स्थिति नाजुक होते हुए भी माता-पिता को लगा कि उनके बेटे को पढ़ना चाहिए। इसलिए उन्होंने उसे शिक्षा के लिए उसके मामा के पास भेज दिया। उसके मामा ने बिरसा को एक मिशनरी स्कूल में भर्ती करा दिया। उन्होंने अपनी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पूरी की। पढ़ाई के दौरान ही उनमें नृत्य और संगीत के प्रति भी प्रेम विकसित हुआ।


 आजादी के समय से ही भारतीय समाज गुलामी की जिंदगी जी रहा था। यहां तक कि जंगल में रहने वाला आदिवासी समुदाय भी इससे मुक्त नहीं था। अंग्रेजों ने वन अधिनियम बनाकर आदिवासियों के जंगल पर पारंपरिक अधिकार को खत्म कर दिया था। इससे आदिवासियों में असंतोष का माहौल था। आजादी के पहले भी उन्हें जल ,जमीन जंगल से बाहर निकालने की कोशिश की गई थी। शिक्षित बिरसा को आदिवासियों का शोषण नहीं देखा नहीं जा रहा था। आदिवासियों की आजीविका मूल रूप से जंगल से मिलने वाले कंद, फल, लकड़ी के टुकड़े और घास पर आधारित थी; लेकिन जब यह सब हो रहा था, तब ब्रिटिश सरकार ने आदिवासियों को दंडित करना शुरू कर दिया। इसलिए एक तरह से आदिवासियों के अस्तित्व का सवाल खड़ा हो गया।

     इसलिए उन्होंने सरकार से न्याय की गुहार लगाई, लेकिन सरकार ने उनकी मांगों को नजरअंदाज कर दिया। इससे आदिवासी समुदाय में भारी असंतोष पैदा हुआ। इसी के चलते बिरसा मुंडा का उदय हुआ। जिन्होंने तमाम आदिवासी समुदाय के लोगों को एकता के सुत्र में बांधकर “उलगुलान” का शृंखनाद किया। आदिवासियों के अस्तित्व पर मंडराते खतरे की वजह से बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था. आदिवासी समुदाय की समस्याओं, उनके सवालों, अन्याय, उत्पीड़न, शोषण, गरीबी और अंधविश्वास को देखकर बिरसा मुंडा को हमेशा लगता था कि मुंडा आदिवासियों को इससे बाहर निकाला जाना चाहिए. यहीं से नेता बिरसा मुंडा का संघर्ष शुरू हुआ. 1857 के विद्रोह के बाद आदिवासियों और अंग्रेजों के बीच संघर्ष जारी रहा. 1895 से 1900 तक पांच सालों के दौरान बिरसा मुंडा द्वारा किया गया महान विद्रोह बहुत बड़ा था. जिसे 'उलगुलान' के नाम से जाना जाता है. अंग्रेजों ने आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों से हटाने की ठानी थी. इसीलिए बिरसा मुंडा ने इसके खिलाफ 'उलगुलान' का आह्वान किया था। बिरसा मुंडा ने सही मायने में आदिवासी पहचान, स्वायत्तता और संस्कृति को बचाने के लिए यह आंदोलन चलाया था। आदिवासी मुद्दों पर लिखने वाली हिंदी लेखिका रमणिका गुप्ता ने अपने लेख 'आदिवासी अस्मिता का संकट' में अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से व्यक्त की है कि “आजादी के पहले जिन इलाकों में आदिवासी बहुल थे, वहां के जंगल और जमीन पर राजाओं, नवाबों और अंग्रेजों का नहीं, बल्कि उस इलाके के लोगों यानी आदिवासियों का स्वामित्व था। राजा-नवाब इन आदिवासियों से लूटपाट करते थे, लेकिन उन्होंने आदिवासियों की संस्कृति और आंतरिक व्यवस्था को कभी नहीं छुआ। अंग्रेजों ने भी शुरुआत में इन्हीं बातों का पालन किया, लेकिन जब रेलवे का विस्तार हुआ तो उन्होंने तत्कालीन मानभूमि (वर्तमान संथाल परगना) में जंगलों को काटना शुरू कर दिया, जिससे आदिवासी विस्थापित होने लगे। अंग्रेजों ने जमींदारी प्रथा लागू की और जहां आदिवासी सामूहिक खेती करते थे, वहां की सारी जमीन जमींदारों को बांट दी और लगान की प्रणाली लागु दी। इस अन्यायी ब्रिटिश शासन की शोषणकारी नीतियों को चुनौती दी गई थी। बिरसा ने 'मुंडा राज' की अवधारणा के तहत आदिवासी समूहों को एकजुट किया, स्वशासन की वकालत की और ब्रिटिश सेनाओं पर गुरिल्ला हमलों का आयोजन किया। उन्होंने औपनिवेशिक सत्ता के प्रतीकों को निशाना बनाया और प्रतिरोध में आदिवासियों ने इसके खिलाफ विद्रोह करना शुरू कर दिया। 

    अंग्रेजों ने जमींदारों और जागीरदारों से किसानों पर अत्यधिक कृषक लगान वसूलना शुरू कर दिया था। बिरसा मुंडा ने इसके खिलाफ समय-समय पर बड़े पैमाने पर आंदोलन किए। अंग्रेजों को यह पसंद नहीं आया, इसलिए उन्होंने बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया और दो साल के लिए हजारीबाग जेल में कैद कर दिया। इसी समय उनके मन में अंग्रेजों के खिलाफ अपार आक्रोश पैदा हुआ और 'उलगुलान' शुरू हो गया। 1897 के बाद बिरसा मुंडा ने अपने पास मौजूद पारंपरिक हथियारों की मदद से अंग्रेजों के खिलाफ कई लड़ाइयाँ लड़ीं। उन्होंने धनुष, तीर और भाले की मदद से अंग्रेजों को हराया; लेकिन आदिवासी क्रांतिकारी आधुनिक हथियारों और सैन्य बल का सामना नहीं कर सके।

     बिरसा मुंडा ने सही पहचाना कि हमारे आदिवासी समुदाय के शोषण की जड़ें विदेशी राजनीतिक व्यवस्था में हैं। इसलिए मुंडा आदिवासी अंग्रेजों और जमींदारों के खिलाफ उठ खड़े हुए।

  उन्होंने समुदाय को एकजुट किया और विद्रोह का झंडा बुलंद किया। यह लड़ाई आजादी के लिए महत्वपूर्ण थी। बिरसा मुंडा जानते थे कि हमारी सेना की संख्या कम है। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए हमारे पास जो हथियार थे, वे भी पारंपरिक थे। इसीलिए उन्होंने गुप्त युद्ध का सहारा लिया। उनकी गतिविधियों के कारण रांची और उसके आसपास के इलाकों में पुलिस ने बिरसा मुंडा को पूरी तरह से हरा दिया था। अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा को पकड़ने के लिए 500 रुपये का इनाम घोषित किया था। गौरतलब है कि यह राशि आज के हिसाब से उस समय बहुत बड़ी थी।

अंग्रेजों ने 12 जनवरी से 25 जनवरी 1900 तक बिरसा मुंडा के आंदोलन को दबाने की बहुत कोशिश की; लेकिन बिरसा का कार्य इतना सुनियोजित था कि अंग्रेज सफल नहीं हो सके।

       बिरसा के नियंत्रण और बिरसा पर समाज के विश्वास को कम करने के लिए अंग्रेजों ने मुंडा लोगों और उनके अनुयायियों को गिरफ्तार कर लिया और उनकी संपत्ति जब्त कर ली, लेकिन फिर भी अंग्रेज बिरसा से डरते रहे। यह आदिवासी संघर्ष क्यों और किस लिए था? इसके बारे में और कुछ कहने की जरूरत नहीं है। मुंडाओं का यह संघर्ष इतना भयानक था कि मुंडा लोग अंग्रेजों को अपने महान नायक के बारे में बताने के लिए तैयार नहीं थे। इस गुस्से में अंग्रेजों ने मुंडाओं पर भयंकर अत्याचार किए, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया और उनकी संपत्ति लूट ली; लेकिन फिर भी मुंडाओं ने अपने नेता के बारे में नहीं बताया।

      जिस तरह आज आदिवासियों के धर्मांतरण का मुद्दा जटिल होता जा रहा है, उस समय भी ऐसा ही था। रांची क्षेत्र के बुड़जू और सरवदा इलाके के कुछ मुंडा लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया था। पुलिस ने ईसाई धर्म अपनाने वालों पर उपरोक्त अन्याय और अत्याचार नहीं किया। बिरसा मुंडा के समर्थकों द्वारा ब्रिटिश पुलिस और अन्याय के खिलाफ़ आहूत इस संघर्ष में कई लोगों को निर्वासित होना पड़ा, कई को सज़ा हुई और कई लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी।

      रांची के पास डुबारी पहाड़ियों में ब्रिटिश सेना और बिरसा मुंडा के बीच निर्णायक लड़ाई हुई थी। बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हजारों मुंडा आदिवासी वहां जुटे थे। यह दिन था 25 जनवरी 1900। अंग्रेजी अखबार स्टेट्समैन की खबर के मुताबिक इसमें 400 आदिवासी क्रांतिकारी शहीद हुए थे। सही मायने में कहा जा सकता है कि यह आजादी की लड़ाई थी। इस लड़ाई में अंग्रेजों की जीत जरूर हुई, लेकिन बिरसा मुंडा उनके हाथ नहीं लगे। जिन लोगों को अंग्रेजों की बंदूकें नहीं पकड़ पाईं, उनका काम महज पांच सौ रुपये में हो गया। बिरसा मुंडा के करीबी लोगों ने ही अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। जननायक को रांची जेल में काफी यातनाएं दी गईं। जेल में ही 9 जून 1900 को वे वीरगति को प्राप्त हुए।

       बिहार में यह उग्रवादी संघर्ष लंबे समय से चल रहा था और आज भी चल रहा है। इसी को माओवाद शब्द से जोड़ दिया गया। आज भी स्थिति नहीं बदली है। आज भी आदिवासियों की जमीन पूंजीपतियों के गले में ठूंसी जा रही है। जल, जंगल और जमीन से उनके हक और अधिकार छीने जा रहे हैं। बिरसा मुंडा द्वारा किया गया यह काम पूरे देश के लिए स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बिरसा मुंडा का योगदान रहा है। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुंडा को भगवान माना जाता है। आज भी आदिवासियों की समस्याएं खत्म नहीं हुई हैं। कवि भुजंग मेश्राम ने अपनी कविता में यह भावना व्यक्त की है कि इन्हें खत्म करने के लिए बिरसा मुंडा का पुनर्जन्म होना चाहिए। वे कहते हैं,

     बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा घास काटती दराती हो या लकडी फाटती कुल्हाडी यहाँ वहाँ से, पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण से कहीं से भी आ मेरे बिरसा खेतों की बहार बनकर लोक तेरी बाठ जोहते।

ऐसे समय में जब आदिवासी समुदाय ब्रिटिश सरकार के दोहरे शोषण और जमींदारों के जुल्म के तले जी रहा था, महापुरुष और जननायक बिरसा मुंडा ने आदिवासी समुदाय में जागरूकता पैदा कर इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाई। जल, जंगल और जमीन के अधिकार के लिए खुद को बलिदान कर वे आदिवासी समुदाय से निकलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी बन गए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आने वाली हर पीढ़ी उनके संघर्ष से प्रेरणा लेगी।

                       प्रोफेसर,हिन्दी विभाग , 

महाराष्ट्र महाविद्यालय ,निलंगा, जिला लातूर.

9423909705

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